
कंप्यूटर टेक्नोलॉजी इज परिकल्पित धारणा पर अवलंबित है, जिसमें कंप्यूटर मनुष्य की। प्रकृति का स्थान ले सकता है। जिस प्रकार सितार वादक के लिए सितार वादन उसकी दूसरी प्रकृति और सहज स्वभाव है उसी तरह कंप्यूटर पर कार्य करना व्यक्ति की दूसरी प्रकृति है। इस दृष्टि से उपकरण की जगह सृजन की प्रक्रिया मुख्य भागीदार है। इस विकास की तीन प्रमुख दिशाएं अग्रलिखित है- (1) कंप्यूटर आकार में छोटा से छोटा और वजन में हल्का से हल्का होना चाहिए। यही कारण है कि कंप्यूटर अब विशाल मेनफ्रेम से छोटा होकर टेबल टॉप, लैपटॉप,पाम टॉप में सिमटता जा रहा है। यहां तक कि वह माइक्रो रूप में मोबाइल फोन और घड़ी के रूप में भी उपलब्ध है। (2) कंप्यूटर को वह प्रयोजन होना चाहिए जिसमें उसमें मानव जीवन के हर प्रयोजन को पूरा करने की क्षमता समाहित होनी चाहिए। आज कम्प्यूटर से टाइपिंग मुद्रण, फोन, फैक्स फोटो, गाना सुनना, वीडियो चलचित्र देखना, कैलकुलेटर, घड़ी, डायरी, खरीदारी करना, डाक्टरी सलाह पाने और ज्ञान विज्ञान। की अघ्तन जानकारी चुटकी में होना प्राप्त कर सकते हैं। (3)कंप्यूटर को अधिक से अधिक प्रयोग ता के लिए सहज और सरल होना चाहिए। कंप्यूटर की प्रारंभिक अवस्था में सामान्य व्यक्ति काम करने से बहुत घबराता था क्योंकि वह इसे विकट तकनीकी मानता था। कंप्यूटर की दुनिया में विंडोज का प्रवेश होने से कम्प्यूटर अनुप्रयोग और परिचालन की संकल्पना बदल गई। अब सामान्य व्यक्ति भी कंप्यूटर पर कोई भी काम कर सकता है। परिणाम यह हुआ कि कम्प्यूटर और सूचना टेक्नोलोजी एक जन आधारित टेक्नोलॉजी की परिणत हो गई जहां प्रवक्ताओं की व्यापकता ही इसी सफलता का मापदंड बन गई।
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